Monday, December 31, 2012

त्याग


ll त्याग ll

तन को प्रिय कामहै, मन को द्वेषराग
जन तो रचै अभिमानमें, ठोर न पावें त्याग

त्याग में है आनंद छिपा, त्याग की जगावें भूख
त्याग की महिमा अनंत, उसी में हैं परम सुख

कुछ त्याग प्रभु देवत हैं, कुछ की कला है जगानी
कुछ त्याग अनिवार्य है, और कुछ को है अपनानी

मल-मूत्र का त्याग सुखद, यह प्रकृति का धर्म
शुक्र त्याग पुरुष का, रजः स्त्री का दैहिक कर्म

त्याग का उचित परिमाण ही, आयु-आरोग्य देत
अति त्याग की परिस्थिति है, रोग-भोग का संकेत

त्याग बिन है जगत अधूरा, इसी से बना समाज
त्यागक्षण की गहराई में ही, छुपा मुक्ति का राज

उस त्यागक्षण में थिर हो पाना, साक्षी भाव के संग
मुक्त हो चित्तवृत्ति से, न ही विकारों का कोई रंग

ऐसे पल की गभीरता का, जप-तप-ध्यान है सार
सबसे उत्कृष्ट त्याग है, तन व मन का व्यापार

इस प्रकार अपने जीवन में हम, त्याग की कला अपनावें
आतम-चैतन्य की परतों को त्याग, परमानन्द को पावें

Wednesday, December 5, 2012

SADHNA KRAM / साधना क्रम

We live in this world with our consciousness distributed among many centres in some proportion or other. If we travel from external gross status towards more internal and subtler states, we will see that our consciousness can have four demarcation lines separating these centres. They are namely, Body (Dehabhav), Intellect (Buddhibhav), Heart (Prembhav) and Spirit (Aatmabhav).

Also, upon finer observation we will find that these different states have their own predominance at different ages of an individual.

During Balyavastha, a child is in a state of Aatmabhav. He looks at the world with amazement (vishmaya). He is neither attached to the world nor detached. He is simply living in the PRESENT and reciprocates his experience 100% genuinely...pleasing or displeasing.

As the child grows, he develops Premabhav. First towards his mother & father, then towards family and friends. Subsequently, though he does develop his Intellect, but is mostly guided by Prembhav upto a certain age. During years of adolescence (Yuvavastha), his Prembhav transforms due to hormonal changes and gets directed towards the opposite sex. Yet his Prembhav continues and dominates...

Further, when he heads towards Praudavastha, more worldly issues associated to sustenance, wealth, security, etc. occupy his priorities. Here his Buddhibhav takes the lead. Through his intellect he engages all the resources to plan his means and achieve his goals.

Then with time, he looses his physical strength and the inevitable wheel of time gradually brings about old age (Vriddhavastha). His focus from time to time gets diverted to the Body (Dehabhav) due to some ailment or other constantly attacking and degenerating his physical self...finally leading to Death, one fine day.

We are all following this standard pattern and day by day coming closer and closer to death. Though, death of the external self is mandatory, but the inner consciousness need not follow the same route.

SADHNA is the process of REVERSING this mundane path of the consciousness and taking it back towards more centred, more subtler states...from Body to Intellect to Heart to Spirit...which is its ORIGIN.


इस पृथ्वी पर हमारे अस्तित्व के दौरान, हमारी चेतना विभिन्न केन्द्रों में विखंडित रहती है l यदि हम बाह्य स्थूल चेतना से क्रमशः सुक्ष्म अंतस की ओर यात्रा करें तो पायेंगे की चार केन्दों में इस चेतना का घनिभूतिकरण होता है l वे हैं, शरीर (देहभाव), विचार (बुद्धिभाव), ह्रदय (प्रेमभाव) एवं आत्मा (आत्मभाव) l

साथ ही यदि हम थोड़ा ध्यान से देखें, तो पायेंगे की चेतना के इन केन्दों का घनिभूतिकरण मनुष्य के जीवनकाल में आयु के अलग-अलग मोड़ पर आता है l

शैशवावस्था के दौरान, शिशु “आत्मभाव” (आत्मा केंद्र) में स्थिर होता है l वह विस्मय से जगत की ओर देखता है l उसकी न ही संसार में आसक्ति होती है और न ही विरक्ति l वह तो केवल वर्तमान में जीता है एवं अपने प्रतिभाव की शत प्रतिशत अभिव्यक्ति करता है...प्रसन्नता अथवा अप्रसन्नता l

ज्यों ज्यों उसकी आयु में वृद्धि होती है, उसमें “प्रेमभाव” उभरता है l सर्वप्रथम अपने माता-पिता के प्रति और तत्पश्चात परिवारजन एवं मित्रों के प्रति l समय के साथ यद्यपि उसमें विचारशक्ति का उदय होता है, परन्तु एक निश्चित आयु तक वह प्रेमभाव के वेग से ही प्रेरित व संचालित रहता है l युवावस्था में उसका यह प्रेमभाव न्यासर्गिक परिवर्तन के फलस्वरूप विपरीत लिंग की ओर आकर्षित होता है l और “प्रेमभाव” (ह्रदय केंद्र) अपना प्रभुत्व रखते हुए कायम रहता है...

जैसे वह प्रौढ़ावस्था की दिशा में बढ़ता है, आजीविका, संपत्ति, सुरक्षा, इत्यादि विविध सांसारिक विषय उसकी प्राथमिकता बन जातें हैं l यहाँ पर “बुद्धिभाव” (विचार केंद्र) अपनी अग्रिमता बनाये रखती है l अपने वैचारिक क्षमता के माध्यम से वह अपनी सारी शक्ति को योजनाबद्ध रूप से अपने ध्येय को पाने में लगा देता है l

और समयचक्र का अनिवार्य अध्याय फ़िर लेकर आता है शारीरिक क्षीणता के साथ, वृद्धावस्था l कोई न कोई रोग अथवा दैहिक कष्ट व्यक्ति की चेतना को बार बार घुमा कर ले आती है “देहभाव” (शरीर केंद्र) में जो की धीरे-धीरे शरीर का क्षय करता है...अंततः एक दिन, मृत्यु शय्या तक l

हम सब इस अबाधित योजना का अनुसरण करते हुए दिन प्रतिदिन मृत्यु के समीप जाते रहते हैं l यद्यपि इस बाह्य देह का पतन निश्चित है, परन्तु हमारी अंतस चेतना इसी योजना का अनुसरण करें ऐसा आवश्यक नहीं l

“साधना” हमारे अंतरंग चेतना को इस बहिरंग योजना से मुक्त कर, उसे पुनः आत्मकेंद्रित कर सूक्ष्मतम की ओर...शरीर केंद्र से विचार केंद्र से हृदय केंद्र से आत्म केंद्र...तक ले जाने की क्रिया है, जो की हमारा मूल उद्गम है l

Saturday, September 8, 2012

समय


"समय की बलिहारी"

समय अति बलवान है, उसके अनेक रूप
ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं, समय के तीन स्वरुप


ब्रह्मा जी हैं भूतकाल, उनकी पूजा न होए
बीत गया सो बीत गया, क्यों पछताए कोए
पर वह हैं हमारा मूल बीज, उत्पत्ति का स्थान
आत्मज्ञान की कुंजी से, ब्रह्म को लो पहचान

महेश भविष्य के हैं कर्ता, जीवन के आधार
काल ग्रास कर अमृत दें, हैं कृपालु अपरम्पार
सुख-शान्ति परमानन्द, जो हो भविष्य की चाह
महेशसम् जो ध्यानरत, पावें तृप्ति की राह

अग्रसर जो नर, मोक्ष मार्ग पर
वर्तमान को, जप-तप से सिंचित कर
वही वर्तमान क्षण, विष्णु का आसन
मनुष्य जीवन का, है श्रेष्ठतम धन
सुमिरन-भजन की राह पर, रख वर्तमान की धार
हरिनाम से रसबोर होवो, वही लगायें पार

समय को जानो, समय पहचानों, समय की महिमा भारी
समय-समय पर समय को साधो, है समय की बलिहारी

Friday, April 27, 2012

गौ-हत्या या गौ-भोग ???


यह बात तो निश्चित है ही की गौ-हत्या का उन्मूलन हो l परन्तु क्या यह विचारधारा केवल गौ मांस के परहेज तक सीमित है? क्या अन्य पशुयों के मांस का सेवन उचित है? अथवा, क्या गौ-माता को जीवित रखकर, उसपर विभिन्न प्रकार की औषधियों का भेदन कर, उसे एक व्यवसायिक यन्त्र के रूप में उपयोग करना सही है? और यह सब क्यों? की वह अधिक से अधिक दूध दे सके, जिससे मनुष्य मलाई, रबड़ी, लस्सी, मिठाई, पनीर...बनाकर अपने आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में उत्पादन व उपभोग कर अपने मुनाफ़ा एवं चर्बी की वृद्धि कर सकें?
प्रकृति ने गौ को (कदाचित अन्य कई प्राणीयों को) यह उपहार दिया है की संतान उत्पत्ति के पश्चात् उस माँ में शिशु की आवश्यकता से तीन गुना अधिक दुग्ध उत्पादन की क्षमता होगी l इस कारण दुग्ध का सेवन यद्यपि कोई क्रूरता नहीं, परन्तु निश्चित रूप से ऋण की भागीदारी है l उस ऋण को उतारने के लिए उद्यम करना है, मनुष्य का परम कर्तव्य l
क्या गौ-मांस पवित्र है या अपवित्र? पशु तो मृत्यु के पश्चात् भी उपयोगी होता है l और मृत्यु तो हर एक प्राणी की अंतिम गति है ही, परन्तु, “मृत्यु के बाद उपयोग और उपयोग के लिए मृत्यु” में आकाश-पाताल का अंतर है l
न ही कोई मांस अपवित्र है और न ही कोई पुष्प पवित्र l जो श्वेत-सुमनोहर पुष्पहार माँ सरस्वती को अर्पण किया जाता है, वह सूख-गलकर दुर्गंधित हो जाने पर उसे तुरंत विसर्जित कर देते हैं l उसी माँ के पूजन स्थल में जहाँ किसी भी प्रकार के मांस का लाना निषिद्ध होता है, उन्हीं के श्री चरणों की प्रेरणा से, उनके सम्मुख, उन वाद्य यंत्रों को साधा जाता है जिनमें से कई यन्त्र पशु के चर्म से ही बने हैं l केवल समय का अंतर है...एक पहले काम आता है तो दूसरा बाद में l
इस सम्पूर्ण विश्लेषण में मुख्य प्रश्न है – परिमाण, संख्या, मात्रा. कितना है उचित? कितनी है आवश्यकता? कितने की है योग्यता? जब साधना का प्रारंभ करते है, तब भी मूल में यही रहता है – संख्या. कितनी माला? कितने आवर्तन? आज के इस उपभोक्तावादी युग के उपभोग की होड़ में हर मनुष्य को अपना प्रमाण निर्धारित करने की तथा उसका अनुमान लगाने की प्रचेष्टा में प्रवृत्त होना, बुद्धिमानी है l
जहाँ एक ओर ‘गौ-हत्या का उन्मूलन’, इस “यम” का अनुबंधन अपेक्षित है...’गौ-भोग का नियंत्रण’ भी है एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण “नियम”...एवं इन्हीं मापदंडों के माध्यम से ही सार्थक हो पायेगा हमारा ध्येय – “गौ-रक्षा” l

Friday, June 24, 2011

The Varnashram System

The Inner Varnashram:
SHARIR (Body) is SHUDRA (The Worker).
BUDDHI (Intellect) is VAISHYA (The Businessperson).
ATMABAL (Will Power) is KSHATRIYA (The Warrior).
ATMA (Soul) is BRAMHIN (The Enlightened).
The Yoga Varnashram:
HATHA YOGA = SHUDRA = BODY (Sharir)
GYANA YOGA = VAISHYA = INTELLECT (Buddhi)
RAJ (Tapasya) YOGA = KSHTRIYA = WILL (Atmabal/Manobal)
BHAKTI YOGA = BRAMHIN = SOUL (Anand)

A purified Body produces purified intellect.
Purified Intellect generates purified Thoughts.
Purified Thoughts instigates purified Actions.
Purified Action surfaces purified Devotion.


ACTIONS:
  • In the aloneness of ownself/innerself, be a Bramhin (ब्राम्हण).
  • While performing sadhna/duties, be a Kshatriya (क्षत्रिय).
  • In dealing with the society, be a Vaishya (वैश्य).
  • While in presence/remembrance of GOD/GURU, be a Shudra (शूद्र).

Yoga Quotes

WHAT people Tell us and then we Feel - are mere INEFERENCES of our Life.
WHAT we Feel and then we Practice - are the REALITIES of our Life.
WHAT we Practice and then we Experience - is THE TRUTH of our Life.
  • Let us only Expand our “Intellect” that much, that it does not Obscure our "Common Sense"
  • Prefer to be with an Enlightened Illiterate, than to be with an Ignorant Scholar.

GYANI (Wise): is the One who doesn't think that he/she is Gyani (Wise)
AGYANI (Ignorant): is the One who doesn't think that he/she is Agyani (Ignorant)


YOGA (Yogasana) Transforms The BODY.
KNOWLEDGE (Gyana) Transforms The INTELLECT.
MEDITATION (Dhyana) Transforms The MIND.
DEVOTION (Bhakti) Transforms The HEART.
MASTER (Guru) Transforms The SOUL.