Saturday, September 8, 2012

समय


"समय की बलिहारी"

समय अति बलवान है, उसके अनेक रूप
ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं, समय के तीन स्वरुप


ब्रह्मा जी हैं भूतकाल, उनकी पूजा न होए
बीत गया सो बीत गया, क्यों पछताए कोए
पर वह हैं हमारा मूल बीज, उत्पत्ति का स्थान
आत्मज्ञान की कुंजी से, ब्रह्म को लो पहचान

महेश भविष्य के हैं कर्ता, जीवन के आधार
काल ग्रास कर अमृत दें, हैं कृपालु अपरम्पार
सुख-शान्ति परमानन्द, जो हो भविष्य की चाह
महेशसम् जो ध्यानरत, पावें तृप्ति की राह

अग्रसर जो नर, मोक्ष मार्ग पर
वर्तमान को, जप-तप से सिंचित कर
वही वर्तमान क्षण, विष्णु का आसन
मनुष्य जीवन का, है श्रेष्ठतम धन
सुमिरन-भजन की राह पर, रख वर्तमान की धार
हरिनाम से रसबोर होवो, वही लगायें पार

समय को जानो, समय पहचानों, समय की महिमा भारी
समय-समय पर समय को साधो, है समय की बलिहारी

Friday, April 27, 2012

गौ-हत्या या गौ-भोग ???


यह बात तो निश्चित है ही की गौ-हत्या का उन्मूलन हो l परन्तु क्या यह विचारधारा केवल गौ मांस के परहेज तक सीमित है? क्या अन्य पशुयों के मांस का सेवन उचित है? अथवा, क्या गौ-माता को जीवित रखकर, उसपर विभिन्न प्रकार की औषधियों का भेदन कर, उसे एक व्यवसायिक यन्त्र के रूप में उपयोग करना सही है? और यह सब क्यों? की वह अधिक से अधिक दूध दे सके, जिससे मनुष्य मलाई, रबड़ी, लस्सी, मिठाई, पनीर...बनाकर अपने आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में उत्पादन व उपभोग कर अपने मुनाफ़ा एवं चर्बी की वृद्धि कर सकें?
प्रकृति ने गौ को (कदाचित अन्य कई प्राणीयों को) यह उपहार दिया है की संतान उत्पत्ति के पश्चात् उस माँ में शिशु की आवश्यकता से तीन गुना अधिक दुग्ध उत्पादन की क्षमता होगी l इस कारण दुग्ध का सेवन यद्यपि कोई क्रूरता नहीं, परन्तु निश्चित रूप से ऋण की भागीदारी है l उस ऋण को उतारने के लिए उद्यम करना है, मनुष्य का परम कर्तव्य l
क्या गौ-मांस पवित्र है या अपवित्र? पशु तो मृत्यु के पश्चात् भी उपयोगी होता है l और मृत्यु तो हर एक प्राणी की अंतिम गति है ही, परन्तु, “मृत्यु के बाद उपयोग और उपयोग के लिए मृत्यु” में आकाश-पाताल का अंतर है l
न ही कोई मांस अपवित्र है और न ही कोई पुष्प पवित्र l जो श्वेत-सुमनोहर पुष्पहार माँ सरस्वती को अर्पण किया जाता है, वह सूख-गलकर दुर्गंधित हो जाने पर उसे तुरंत विसर्जित कर देते हैं l उसी माँ के पूजन स्थल में जहाँ किसी भी प्रकार के मांस का लाना निषिद्ध होता है, उन्हीं के श्री चरणों की प्रेरणा से, उनके सम्मुख, उन वाद्य यंत्रों को साधा जाता है जिनमें से कई यन्त्र पशु के चर्म से ही बने हैं l केवल समय का अंतर है...एक पहले काम आता है तो दूसरा बाद में l
इस सम्पूर्ण विश्लेषण में मुख्य प्रश्न है – परिमाण, संख्या, मात्रा. कितना है उचित? कितनी है आवश्यकता? कितने की है योग्यता? जब साधना का प्रारंभ करते है, तब भी मूल में यही रहता है – संख्या. कितनी माला? कितने आवर्तन? आज के इस उपभोक्तावादी युग के उपभोग की होड़ में हर मनुष्य को अपना प्रमाण निर्धारित करने की तथा उसका अनुमान लगाने की प्रचेष्टा में प्रवृत्त होना, बुद्धिमानी है l
जहाँ एक ओर ‘गौ-हत्या का उन्मूलन’, इस “यम” का अनुबंधन अपेक्षित है...’गौ-भोग का नियंत्रण’ भी है एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण “नियम”...एवं इन्हीं मापदंडों के माध्यम से ही सार्थक हो पायेगा हमारा ध्येय – “गौ-रक्षा” l

Friday, June 24, 2011

The Varnashram System

The Inner Varnashram:
SHARIR (Body) is SHUDRA (The Worker).
BUDDHI (Intellect) is VAISHYA (The Businessperson).
ATMABAL (Will Power) is KSHATRIYA (The Warrior).
ATMA (Soul) is BRAMHIN (The Enlightened).
The Yoga Varnashram:
HATHA YOGA = SHUDRA = BODY (Sharir)
GYANA YOGA = VAISHYA = INTELLECT (Buddhi)
RAJ (Tapasya) YOGA = KSHTRIYA = WILL (Atmabal/Manobal)
BHAKTI YOGA = BRAMHIN = SOUL (Anand)

A purified Body produces purified intellect.
Purified Intellect generates purified Thoughts.
Purified Thoughts instigates purified Actions.
Purified Action surfaces purified Devotion.


ACTIONS:
  • In the aloneness of ownself/innerself, be a Bramhin (ब्राम्हण).
  • While performing sadhna/duties, be a Kshatriya (क्षत्रिय).
  • In dealing with the society, be a Vaishya (वैश्य).
  • While in presence/remembrance of GOD/GURU, be a Shudra (शूद्र).

Yoga Quotes

WHAT people Tell us and then we Feel - are mere INEFERENCES of our Life.
WHAT we Feel and then we Practice - are the REALITIES of our Life.
WHAT we Practice and then we Experience - is THE TRUTH of our Life.
  • Let us only Expand our “Intellect” that much, that it does not Obscure our "Common Sense"
  • Prefer to be with an Enlightened Illiterate, than to be with an Ignorant Scholar.

GYANI (Wise): is the One who doesn't think that he/she is Gyani (Wise)
AGYANI (Ignorant): is the One who doesn't think that he/she is Agyani (Ignorant)


YOGA (Yogasana) Transforms The BODY.
KNOWLEDGE (Gyana) Transforms The INTELLECT.
MEDITATION (Dhyana) Transforms The MIND.
DEVOTION (Bhakti) Transforms The HEART.
MASTER (Guru) Transforms The SOUL.

Saturday, June 18, 2011

यज्ञ विज्ञान

सम्पुर्ण विश्व की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बिंदु है, भारतवर्ष l विश्व के किसी भी कोने में जहाँ कहीं भी आध्यात्मिक गवेषकों ने आत्मिक आनंद, कर्म की परिभाषा और प्रकृति में निहित रहस्यों के अनुसन्धान में विवेचना की, तो उन्हें स्पष्टतः सबसे अधिक तर्कसंयुक्त, आधुनिक विज्ञान से मेल खाता हुआ और कोई अनुभवप्रेरित तथ्य की प्रतीति हुई, तो वह थी इस आर्यावर्त से उपजी, वैदिक ऋचायों द्वारा उद्भासित एक अद्भुत संस्कृति l उसी संस्कृति की अगाध खान में से एक अल्प आचमन, एक अकाट्य विज्ञान है यह - यज्ञ विधान l
आज का समाज तार्किक परिपेक्ष में ही वार्तालाप करने का आदि है, और इस में कोई गलत बात भी नहीं l अंधविश्वास एवं रूढ़ीवादिता से ग्रस्त मानसिकता किसी भी समाज के लिये उपयोगी नहीं l परन्तु तर्क के साथ आवश्यक है, धैर्य, विश्वास, आस्था और अज्ञात में अनुसन्धान करने की चाह l
वैदिक संस्कृति ने कई उपाय बताये हैं, योग, ध्यान, मंत्र, प्राणायाम...जिसके द्वारा आतंरिक आंदोलन, आतंरिक शुद्धि, आतंरिक चेतना का अनुभव किया जा सकता है l उसी सन्दर्भ में यज्ञ-यागादि विधान, वैदिक ज्ञान का एक अभूतपूर्व बाह्य प्रयोग है l जिस तरह ध्यान, मंत्रजाप, प्राणायाम, आदि के द्वारा मनुष्य अपने शरीर और अंतश्चेतना का पोषण करता है, यह अत्यंत आवश्यक है की वह उस पृथ्वी और प्रकृति जिसमे की वह स्वयं वास करता है, उसका भी पोषण करें l क्योंकि हमारे जीवन के समस्याओं, विशेषतः आधिदैविक एवं आधिभौतिक, के निदान की यदि कोई पध्यति है, तो वह है यज्ञ विधान l
मनुष्य जो अनाज खाता है, वह पेट में जाकर परिवर्तित हो जाता है ... खून, मांस पेशियाँ, चर्बी, इत्यादि में l उस खाद्य पदार्थ के विघटन की क्रिया तो आधुनिक विज्ञान विस्तृत रूप से दे सकती है, पर क्या आज तक विज्ञान कोई ऐसा यंत्र बना पाई है, जिसमें हम रोटी, दाल, सब्जी, चावल...डाल दें और वह उसे रक्त, मांस, मज्जे...में परिवर्तित कर दें? इस शरीर के अंदर किस प्रक्रिया से यह रूपांतरण हो रहा है, उसका कोई अनुमान वैज्ञानिकों को नहीं है l कहने का तात्पर्य यह है की Modern Science इस प्रकृति में घट रहे हर एक क्रिया-कलाप को समझने में असमर्थ है l शायद इस तरह का यंत्र बनाने में हजारों वर्ष लग जाएँ, तब भी बन पायेगा या नहीं कहना मुश्किल है l
हम पेट की भूख को जठराग्नि कहते हैं और खाद्य द्रव्य उस जठर की अग्नि की उर्जा से रूपांतरित होकर शरीर को पोषण देती है l आयुर्वेद में कहा गया है की सिर्फ़ पौष्टिक खाद्य पदार्थ ही नहीं, पाचन और स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है की खाने की प्रक्रिया, स्थिर चित्त एवं शांत मन से किया जाये l अति स्वादिष्ट भोजन भी तृप्ति और पुष्टि देने में असमर्थ है यदि मन विक्षिप्त हो l
ठीक उसी तरह से, यज्ञाग्नि माध्यम है इस प्रकृति को पोषण करने का l चूंकि यह प्रकृति हमारा पालक है और हमारा जीवन उसी के नियमों के आधीन है, यह अत्यंत आवश्यक है की हम इसके साथ एकात्मकता स्थापित करें l और यज्ञ विधान, उसी सन्दर्भ में एक आध्यात्मिक प्रयोग हैं l हम हूत-द्रव्य के माध्यम से, एक योजनाबद्ध तंत्र के द्वारा उस प्रकृति को पोषक तत्व का संचार करतें हैं l अग्नि की उर्जा एवं वैदिक मंत्रोच्चार के कंपन का संगठित आन्दोलन उस हूत-द्रव्य को परिवर्तित करती है किसी सुक्ष्म तत्व में, जो की वायुमंडल में स्थित प्राण-उर्जा को निहित सकारात्मक वेग प्रदान करती है l और प्रकृति उसका रूपांतरण कर हम सब के लिये सुख, शांति और आनंददायक परिस्थिति का निर्माण करती है l यह ही इस यज्ञ प्रणाली का ध्येय है l
जैसे खाद्य को ठीक ढंग से पाचन करने के लिये ज़रूरी है की हम शांत चित्त से उचित खाद्य ग्रहण करें, ठीक वैसे ही, धैर्य और आस्थायुक्त मनःस्थिति में किया हुआ प्रामाणिक यज्ञ विधान इस युग में त्वरित फलप्रदायक उपाय है l
इन वैदिक विधायों का पुनरुद्धार ही मनुष्य जीवन को शांति, तृप्ति एवं पूर्णता देने की दिशा है l अस्तु  l

Friday, June 17, 2011

अमृतस्य पुत्राः



THE 42 MONKS OF INDIA:
A Divine Compilation of 42 Great Saints from India. The Prime Tenure of most of these personalities dates before 1950. Adding to this Group, here are some Great Personalities (अमृतस्य पुत्राः) who endeavoured a lot for Spiritual Upliftment / Awakening of the Society, whose Prime Work Tenure falls mostly in between 1950 to 2000 .... highlighting them in order of their chronological appearance.

A.C.BHAKTIVEDANTA SWAMI PRABHUPADA - He propagated The Bhakti Movement of "SRI CHAITANYA MAHAPRABHU" and spread it to the whole world. Bhakti, normally known to be the easiest way to attain God Realization, Grass-root Traditional and Quite Unfamiliar to the western world, by His herculean efforts, got absorbed by the masses and has inspired millions since then.

SRIRAM SHARMA ACHARYA - एक स्वतंत्र सेनानी, साधक एवं समाज सेवक के रूप में आचार्य जी ने अद्भुत भूमिका निभाई l वेदों के ज्ञान को अत्यंत सहज रूप में जन-सामान्य तक पहुँचाने का भगीरथ प्रयत्न किया l कर्म-कांडी आचार्यों के अनेकों कटाक्ष सहन कर के भी उन्होंने साधारण मनुष्य को वैदिक मार्ग की ओर प्रवृत्त किया, तथा उनके हृदय में वेदमाता एवं यज्ञ-विधान के प्रति आस्था का एक अनोखा बीजारोपण किया l

OSHO - This world will probably not see another such philosopher in next 500 years. No one really popularized the term MEDITATION as much as was done by the efforts of Osho alone. He extracted Meditation (ध्यान) from the clutches of systematic yogic discipline (अष्टांग योग) in order to place it to probably the most unprepared recipients of the west, through Dynamic Mediation techniques and much more. Criticized for many reasons, no one can ever challenge this Seer's Depth & Dynamism.

DR.NARAYAN DUTT SHRIMALI - यह है, एक अति साधारण व्यक्ति की असाधारण जीवन गाथा l शायद ही अध्यात्म का कोई ऐसा क्षेत्र हो, कोई ऐसी गूढ़ विद्या हो, जो इनसे अछूता रहा हो l एक पूर्ण व्यक्तित्व l सिर्फ़ एक ही जीवन में इतनी विविधतायों का समावेश, आज उनके निर्वाण के एक दशक पश्चात भी साधक समाज को अचंभित करती है l भारतीय अध्यात्म का क्षेत्र तो बहु आयामी है, भक्ति, पूजन, कीर्तन, योग, ध्यान, जप-तप, हवन-यज्ञ और न जाने कितने ही मार्ग संतों ने, सिद्धों ने प्रतिपादित किये हैं l इस कलिकाल में उनके प्रति जन जाग्रति फैलाना निश्चित रूप के कठिन कार्य है, परन्तु, यदि कोई ऐसा मार्ग हो जिसपर चलने से सिद्धगण भी कतरायें और जिसकी पूर्व-योग्यता का स्तर ही अत्यंत कष्ट-साध्य हो, तो वह पथ हैं - "तंत्र" l इस मार्ग की इन सभी विषमतायों की उपेक्षा करते हुए, उन तंत्र विद्याओं को लुप्तता की कोख से उद्धार करने हेतु उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पण किया l तंत्र मार्ग को लोक-भोग्य बनाकर उससे सम्बंधित कुप्रथायों का उन्होंने उन्मूलन किया l अनेकों शिष्य उनकी प्रेरणा से शुद्ध तंत्र की ओर अग्रसर हुए, यद्यपि इस कार्य को सार्थक करने हेतु उन्हें व्यक्तिगत एवं सामाजिक परिपेक्ष में कई कर्म यातनाएं भोगनी पड़ी l परन्तु कोई भी परिस्थिति उनके संकल्प तो ध्वस्त न कर सकी l

ll Hari Om Tat Sat - हरि ॐ  तत् सत् ll